गंगू दुलहिन

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हां यही नाम था उनका। रेलवे गंज हरदोई सराय के पीछे वाली गली और उसके बगल वाली गली दोनों में वे ही काम करती थीं। हमारी नानी जी के घर पर भी वही काम करती थीं। कई बार घर की चौखट पर खड़े होकर उनको चाची चाची कहकर हमारी नानी को बुलाते हुए सुना था। मम्मी को जीजी कहती थी। लंबा इकहरा शरीर चेहरे पर चेचक के दाग, हंसते समय बड़े दांत दिख जाते थे। कई बार सोचता था उनका नाम गंगू दुल्हन क्यों है?
क्योंकि गंगू गंगा या गंगाराम की पत्नी थीं यानि की दुलहन थी गंगू की। इस मोहल्ले में वे ब्याहकर ऑईं थीं। इसलिए उनका नाम सारे मोहल्ले में गंगू दुलहिन पड़ गया और वह इसी नाम से जानी जाती थीं।
कई वर्षों के बाद गली में कुछ दूसरे प्रकार की रौनक थी। छम-छम ध्वनि करती हुई एक आकृति गली में बढ़ रही थी। घूंघट से मुंह ढका था और नई बात थी कि वह चप्पल पहने थी। नयी दुल्हन की तरह थोड़े गहने पहने हुए थे। पायल के घुंघरूओ की आवाज आरही थी।
गली में हर घर के पाखाने की सफाई कर रही थी। गली में दूसरी तरफ एक सुनार का घर था। उसकी पहली मंजिल पर झरोखे में लड़का खड़े होकर कुछ व्यंग कस रहा था। रामप्यारी कह करके कुछ बुला रहा था। कुछ दिनों के बाद पता चला कि यह गंगू दुल्हन की बहू है और नई शादी हो करके हाल ही में आई है इसका नाम ही रामप्यारी है। उसके हाथ में बड़ा सा नादी नुमा, बेत से बिनी हुई डलिया सी थी और एक औजार जो हमेशा रहता था। वह साइकिल के पहिए का कवर होता है उसको एक तरफ पतला करके और दूसरी तरफ से पकड़ने लायक घुमा कर बनाया हुआ हैंडल था। एक ना एक दिन वे सुनार के लड़के इस बहू को कुछ न कुछ कह कर छेडते रहते थे। चाहे देवर भाभी के रिश्ते से या फिर नवयुवक यौवन की दहलीज पर कदम रखते हुए एक कम वय की नवविवाहिता के नाते उसे लोलुप नजरो से देखते थे। हारकर रामप्यारी कई बार कुछ घरों की बुजुर्ग महिलाओं को बोल चुकी थी कि देखो बहुत दिक्कत है परेशान करत हैं। हमें नीक नाइ लागत है। परंतु मोहल्लेदारी या रिश्तेदारी के नाते लड़कों और इस नई नवेली बहू का रिश्ता देवर भौजाई का था इसलिए इस तरीके के छोटे-मोटे मजाक समाज में चलते रहते थे और लोग इस पर कोई ध्यान नही देते थे। आजकल होता पुलिस वगैरह शिकायत हो जाती।
बहुत छोटे पर जब हम लोग नानी के यहां जाते थे तब से गंगू दुल्हन को ही हमने पखाना साफ करते देखा था। हर घर में पखाना गली की तरफ ही खुलता था। कुछ के दरवाजे अच्छे बने होते थे और बड़े होते थे। बड़े घरों के पखाने बड़े होते थे उनमें बड़े दरवाजे थे। कमरा नुमा रहता था और कुछ घरों में तो बोरे का या पीपे की टिन का पर्दा पड़ा रहता था। और रोज ही अक्सर लोगों के बीच झगड़ा होता था। विषय यही रहता था कि उनका दरवाजा टूटा पड़ा है पखाना खुला है। अच्छा नहीं लगता है। बंद करो। ढंग का कुछ क्यों नहीं बना लेते। करें भी क्या? उस स्वच्छता कर्मियों की कॉलोनी के भुजंग सुअर गली में कई बार ताक लगाकर के सारे पखानों में हमला कर बैठते थे। और जरा सा भी मौका पाया पखानों के पल्ले ढीले मिले तो थोड़े टूटे हुए दरवाजों को तहस नहस कर डालते थे। बोरी के परदे और छोटी मोटी टिन के परदे उनके सामने टिकते नहीं थे। गली में दो-तीन बार यह विश्व युद्ध सा दृश्य दिखाई देता था। इसके बाद गली के सारे निवासियों में आपस में झडप होती थी और खूब कहा सुनी होती थी। यही कि हमारे घर के दरवाजे के सामने तुम्हारा पखाना पड़ता है इसलिए इसको बंद करके रखो अच्छा नहीं लगता। कोई आता जाता है तो अच्छा नहीं लगता है।
ऐसे माहौल में गंगू दुलहिन एक परमानेंट फिगर रहती थी। उनके बिना तो गली का काम ही नहीं चलता था। रोज सवेरे आना सफाई करना और फिर अगर समय हुआ तो घरों में जाकर के तगादा करना उलाहना देना कि इस महीने में कुछ नहीं मिला। पैसे नहीं मिले, कुछ भी नहीं मिला।
हमारे घर में आकर के नीचे चौखट पर खड़ी हो करके चाची चाची कह कर बुलाती थी। मेरी नानी की झरोखे से ही उनसे आपस में वार्तालाप होती रहती थी। हमारी नानी उन्हे कभी मना नहीं करती थी किसी बात के लिए। इसलिए गंगू दुल्हन अपनी चाची के पास आकर सभी तरह की बातें करलेती थी। और अगर कुछ मदद होती थी तो वह कैसे भी प्राप्त कर लेती थीं। पैसे या कपड़े या खाने का हो किसी भी तरह की मदद उसमें हम लोग कुछ भी नहीं कर पाते थे। बस दूर से ही सुनते थे और खुदही वे दोनों आपस में ही निपटारा कर लेती थी। हमारी नानी की एक परचून की दुकान भी थी।
गर्मियों की छुट्टियों में जब हम लोग जाते थे तो गली के कई लोग इसमें कुछ भुर्जी के परिवार, एक दो कसाई के परिवार, धोबी का परिवार और गंगू दुलहिन नानी के घर से कुएं का पानी लेने के लिए आ जाते थे। पता नही क्यूं। वे जब भी आती थीं, घर के बाहर से अंदर आने पर एक बरोठा था, आज की भाषा में बरामदा सा था, वे उसकी देहरी कभी पार नहीं करती थी। उन्होंने वह एक मर्यादा सी लक्ष्मण रेखा खीच रखी थी। जीवन पर्यंत यह मर्यादा निभाई।
कई बार ऐसे अवसर आए जब नानी जी की तबीयत खराब थी। या फिर कोई बहुत जरूरी काम था तब नानी जी ने उन्हें पहली मंजिल तक बुलाया। वह भी केवल जीना जहां खत्म होता है उस देहरी तक उसके पार कभी नहीं। पर यह कभी नही लगा कि यह चाची और उनकी भतीजी के बीच कोई अदृश्य रेखा थी। सीमा थी। या रिश्तो की डोर थी। जो कि दोनों तरफ से समान रुप से खींची हुई थी। उसका उन्होंने सदैव पालन किया। हम लोगों को गंगू दुल्हन का हमेशा से मुस्कुराता चेहरा ही दिखाई दिया। जो सदैव गरिमामयी पल्लू से ढका रहता था। गली के छोर पर एक घर था। गली में उसकी निकासी नहीं थी। गली के दूसरी तरफ दूसरी गली में उस घर का निकास द्वार था परंतु हमारी गली में उस घर में दो बड़े दरवाजे नुमा खिड़कियां थी। जब ईद या बकरीद या कोई शादी विवाह आदि कोई अवसर पड़ते थे तब हम लोग उन खिड़कियों की सांको में से झांक कर घर के अंदर देखने की चेष्टा करते थे। उसमे रेशमा रहतीं थीं। गर्मियों में रेशमा भी कुएं का पानी लेने आती थीं। वे भी देहरी के बाहर खड़े होकर के दरवाजे पर चाची चाची की गुहार लगाती थी। चाची(यानि कि हमारी नानी) पहली मंजिल वाले झरोखे पर आकर के उत्तर देती थी। तब पता चलता था कि रेशमा को कुएं का ठंडा पानी चाहिए। लोग शाय़द इसलिए आते थे कि उस कुएं का पानी ठण्डा और मीठा था। पर कुंए तो कई और घरों में भी थे? पर हमें लगता है कि नानी जी शायद ऐसी जरूरी चीजों के लिए मना नहीं करतीं थीं। और घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं था इसलिए समाज की सोच कि अकेली विधवा महिला है तो लड़ नहीं पाएंगी दूसरे घरों में पुरुष मालिक होते हैं और उनसे ही पूछ्ना पड़ेगा।
समय बदल चुका था। 1980 का समय था। समाज में बहुत बदलाव आ चुका था। तो हमारी नानी की तरफ से जो कि एक मकान मालकिन थी विधवा थी स्वरोजगार थी कभी भी इस बात के लिए किसी को पानी के लिए मना नहीं करा। हां सामाजिक लोकाचार अपनाते हुए किसी ना किसी से बोला जाता था कि पानी भर करके उनकी बाल्टी में डाल दो। कई बार तो दो एक किराएदार नाराज होने लगे पर नानी जी ने एक नही सुनी। करते भी तो क्या करते उनको घर बदलना पड़ता। पर बिना किराए के कौन उनको मकान देता।
उस सराय में भी एक बड़ा सा कुऑ था पर पता नहीं वहां वो लोग नहीं जाते थे। रेशमा के घर से कुछ कदमों पर ही सरांय थी। दो घर छोड़कर ही थी। और उनके धर्म व‌ बिरादरी के लोग थे शायद या फिर ‌रेशमा की जाती भी अपने समाज में आखरी छोर पर होगी।
हमार नानी के घर के कुएं काही पानी लेकर जाते थे, रोज नहीं, पर कभी कभार। फिर तो कालांतर में जबसे नगर निगम शुरू हुआ उनकी तरफ से नल की सुविधा होने लगी रेशमा और कमला मौसी के द्वार के पास में भी हैंडपंप था और बाद में फिर नलका भी लगा। तब तो किसी के घर जाने की किसी को जरुरत ही नहीं पड़ती थी। पर फिर भी गर्मियों में कुंए का ठण्डा पानी लेने वे लोग नानी के घर ही आते थे। परंतु सामाजिक संबंध और चाची और मौसी और जीजी आदि के संबोधन हमेशा जीवित रहते हैं। और आज भी हैं। उनको कभी भी नहीं तोड़ा जा सकता। यही हमारे समाज की रीढ़ थे आपसी भाईचारा। और स्त्रियों मोहल्ले की महिलाओं द्वारा‌ इसको शदियों से सहज कर रखा गया है अभी तक। इसको ही कह सकते हैं गंगा जमनी तहजी। और वह‌ सदैव जीवित है।

 

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