रमेश हलवाई Ramesh Halwai?

रमेश हलवाई
रेलवे गंज हरदोई के उस मोहल्ले में मेरी नानी का मकान था। वहां पर एक किरायेदार रहते थे उनका नाम था रमेश। जब हम छोटे थे 1971 में मांटेसरी स्कूल में पढ़ते थे कक्षा चार में। तब अक्सर रेलवे स्टेशन की तरफ चले जाते थे। उस को बोलते थे रेलवे फाटक वाली रोड। रेलवेस्टेशन तो दूसरी रोड पर पड़ता था। इस रोड को मोहलिया जाने वाली रोड कहते थे। फाटक के पास कुछ दुकाने थीं उनमें से एक दुकान रमेश की थी। अक्सर जब जाते थे तब उसमें कुछ मिठाई पेड़ा समोसा आदि मिलते थे।

कई वर्ष उपरांत जब हम लोग कानपुर रहने लगे तब कभी-कभार छुट्टियों में ही जाने का अवसर मिलता था। जब फाटक वाली रोड पर पहुंचे तो देखा रमेश की दुकान थोड़ी उजड़ी उजड़ी दिख रही थी। ना तो उसमें रौनक थी न मिठाइयां दिख रही थी। कुछ एक टूटी-फूटी अलमारी जिसमें कांच लगे हुए थे पुरानी अलमारी थी। एक कोने में उनका लड़का बैठा था। क्योंकि लड़का बड़ा हो रहा था 10 या 11 साल का हो गया था लिहाजा उसे भी पिता का हाथ बटाना था। थोड़ी समोसे आदि पकौड़ी जैसी कोई चीज बिक रही थी।

साल भर बाद गए तो पता चला घर में ही आंगन में उनकी पत्नी और लड़कियां समोसा आदि बना रहे थे। आश्चर्य हुआ कि कुछ समय में इनका रहने का स्तर कैसे इतना गिर गया? छोटे पर तो होश नहीं था पर इतना पता चला था कि रमेश दुलहिन एक किसी बड़े प्रतिष्ठित हलवाई की पुत्री थीं। उन हलवाई की दो या तीन ही लड़कियां ही थी कोई पुत्र नहीं था। हरदोई शहर में और लड़कियां रहती थी आपस में उनका बनता नहीं था। पिता का जो धन जायदाद थी इन तीन चार बहनों में ही बट चुकी थी। पहले तो इनका घर ठीक ठाक दिखता था। हम इनके घर में जाते थे। बड़ी लड़की का नाम था अबलेश कमलेश हमारा नाम था। छोटी बहन का नाम मिथिलेश था। लड़के का लड़के का नाम मुझे याद नहीं है। एक और छोटी सी लड़की थी। याह तो मुझे पता दो या तीन बच्चों का जन्म तो हमारे सामने ही उसी घर में हुआ था। उस समय पता नहीं क्यों अस्पताल नहीं जाते थे बच्चे के जन्म के लिए। जचकी घर में ही हो जाती थी कई बार दाई आ जाती क ई बार नहीं। नानी के मोहल्ला में मैंने कम से कम लगभग हर घर में जन्म घर में ही होते देखा है। परंतु हमारी बहन का जन्म हरदोई अस्पताल में हुआ था। अब इसको अज्ञानता अनभिज्ञता कहें या फिर अभाव? संसाधनों का अभाव जिसकी वजह से लोग हस्पताल अस्पताल नहीं जा पाते हैं बच्चे का जन्म कराने के लिए। हो सकता है की गरीबी या संसाधन की कमी! आर्थिक रुप से कमजोरी ही एक बड़ा कारण हो जिससे कि लोग जन्म के लिए मां को अस्पताल नहीं ले जा पाते?

बात हम बता रहे थे कि कैसे उस घर का आर्थिक संतुलन बिगड़ गया। एक दो बार मैंने उनको बोला था कि आप अपना खाता खोल लीजिए पासबुक अपने पास रखिए। बैंक में जाइए और चुपचाप पैसे डाल लिया करिए हर महीना किसी को पता ही नहीं चलेगा। तो वह हंसती थी मेरे ऊपर। तो मुझे पता नहीं था उसके पीछे क्या कारण था। चूंकि मैं नानी के साथ हिन्दुस्तान कामर्शियल बैंक जाता था पासबुक भी देखी थी इसलिए मैंने उनसे भी यही करने को कहा था।
कुछ वर्षों के अंतराल में मैंने देखा वह कई बार ऊपर आती थी नानी से कुछ पैसे उधार मांगती थीं चुपचाप जिससे किसी को पता न चले। कभी दो रुपया या पांच रुपया। आज रुपया भी कोई रुपए होते उधार मांगने के लिए। पर उस समय में उनके कमरे का किराया लगभग ₹15 या २५ ₹ था।
फिर अगली साल हम गए तो पता चला बड़ी बेटी को टीबी हो गई। मुझे तो विश्वास न हुआ। कैसे हो गई इसका कुछ पता नहीं चला। कि डॉक्टर को दिखाया या नहीं यह भी नहीं पता चला। जिस घर में बच्चे के जन्म के समय मां को अस्पताल ना ले जा सके उस घर में हम क्या आशा कर सकते कि वो बच्चों को डॉक्टर को दिखाएगा? कैसे दिखाएगा? और वह भी चार बच्चे?
फिर अगले वर्ष पता चला अबलेश की मृत्यु हो गई। अब मिथलेश बड़ी हो गई। उसकी छोटी बहन भी काम काज करने लगी। लड़का बिगड़ गया घर से भागा रहता था। और यह सब हुआ दो तीन साल में। मैंने सुना रमेश बहुत शराब के आदी हो गए थे और शायद जुंआं भी खेलते थे। रात बिरात आने जाने का कोई समय नहीं था उनका। करते-करते घर की हालत खराब हो गई। घर के आंगन में ही रमेशदुलहिन चूल्हा जलाकर जो सामान आ जाता उससे इमली की चटनी टमाटर की चटनी समोसा कचोरी कुछ इस प्रकार की चीजें बना देती फिर वे सब चीजें दुकान जाती। दुकान से जो बीक कर आता होगा या नहीं आता होगा उसमें पूरा घर गुजारा करता। एक मां तीन बच्चे शराबी पति पता नहीं कैसे गुजारा करते थे। एक साल जब गया तो देखा कि उनके चश्मा लग गया था अब उसमें से भी उनको दिखता था कि नहीं दिखता था। हर साल जाने से ऐसा लगता जैसे वह चश्मे को हिला हिला के प्रयास करती देखती आगे बढ़ती और घर का सारा काम करती। कौन जानता है कि उस चश्मे से उनको दिखाई देता था या नहीं? आंख दिखाने के लिए चश्मा बनवाने के लिए वे कहां जाती? और फिर वे अपनी पीड़ा किसको बतातीं? उस समय कोई घर-घर जाकर लोगों को अस्पताल वाले तो नहीं देखते थे? हम तो छोटे थे क्या बहाना बनाएं? ऊपर से देखते मन मसोस कर रह जाता। खाने-पीने की चीजों से ही मदद कर पाता था।
दीपावली आई। मैंने देखा आंगन में ही रमेश ने शक्कर की बतासे बनाने शुरू करे। शक्कर के खिलौने बनाए। वहां पर ही मैंने देखा कि कैसे छोटे और बड़े कई तरीके की शक्कर के बतासे बनाए जाते हैं कैसे शक्कर के खिलौने बनाए जाते हैं।
हो सकता है कि वो एक मंझे हुए हलवाई रहे होंगे उनको हलवाई की क्राफ्ट आती थी हलवाई गुण आता था इसलिए उनके पास हुनर कला तो थी परंतु पता नहीं क्यों उनको सफलता वह नहीं मिल पा रही थी? बिजनेस फेल होगया था। मार्किट ने अपने को जमा नहीं पा रहे थे। नानी क्योंकि मकान मालिक थीं इसलिए कई बार गुस्सा भी हुई थी कि आंगन में लाकर के सामान और भट्टी और तरह-तरह जो उपकरण इस्तेमाल करते हैं जिससे कि मकान को भी छति पहुंचती है और अगल बगल के रिश्तेदार भी शिकायत दर्ज करवाते हैं कि उनको असुविधा होती है। गरीब परिवार था इसलिए शायद नानीजी चुप रह जाती थी। सुन लेती थी। परंतु बहुत ही कठिन जीवन था उन लोगों का।
हम तो उनको मामी कहते थे। जब भी ऊपर मिलने आती थी नानी से उनके चेहरे पर एक सीमित मुस्कान ही रहती थी। जो कि एक आवरण ही होती थी। मुझे पता थी यह बात। हम तो एक महीना या 20 दिन के लिए ही छुट्टियों में जाते थे परंतु देख तो लेते थे उनकी हालत।
धीरे-धीरे उनके सारे अच्छे वस्त्र छूट गए साज सिंगार सब छूट गया हाथ के कंगन बिछिया मांग बेंदा गले का हार कान की बालियां कुंडल जो भी स्त्रीयोचित श्रृंगार की चीजें थी वो सबसे दूर हो गई थीं। यहां तक कि लगता वह स्नान भी नहीं करती थी रोज। नहीं कर पाती थी साबुन कहां से आएगा? रोज शरीर को और कपड़े धोने के लिए? बरतन कढ़ाई वगैरह धोना तो मजबूरी थी क्योंकि दूसरे दिन उसमे उनको फिर बनाना था।
हम देखते थे कि उस घर में खाना नहीं था पेट भर कर। पर बच्चियां और मां समोसा चटनी और तरह-तरह के चीजें बनाती थी पर मजाल कि उनमें से चख भी लें। हलवाई की पुत्री थीं और शायद जानती थीं बिजनेस के उसूलों को? झूठा नहीं करना चाहिए? या फिर पुरुष का भर।
पर मैंने जहां तक देखा है कि बच्चे और मां अक्सर भूखे ही‌ रह जाते थे। हम लोग जब बारहवी में आ गए उसके बाद पढाई में इतने व्यस्त हो गए कि कई वर्षों तक हरदोई जाना नहीं हुआ। कई वर्षों के बाद देखा पूरा घर सूनसान हो गया था जसे उसमें कोई रहता ही नहीं था। पता चला सब लोग चले गए। किसी की मौत हो गई। किसी का क्या हुआ कोई बताने वाला भी नहीं था। लड़का कभी कभार आता था एक दो बार पर रमेश का कुछ पता नहीं चला।
दुख लगता है कि एक कैसे एक कर्मठ परिवार पूरा खत्म हो गया। शायद आर्थिक कमजोरी के कारण या फिर हमारे सरकारी सामाजिक सुविधाओं को जरुरतमंद तक ना पहुंच पाने के कारण। जन सुविधाओं को जनता तक या गरीब तक ना पहुंच पाना?
या फिर समाज के रूप में विफल होना?
बीमारी और दवाई में लोग ज्यादा मदद नहीं कर पाते हैं। खाना तो आस पड़ोस से मिल जाता है परंतु बार-बार अस्पताल जाना, डॉक्टरों की फीस, दवाइयों का खर्च, आदि थोड़ा कठिन हो जाता है दूसरों के लिए।
जहां तक मैंने देखा है क्योंकि लोग आस पड़ोस के खुद भी गरीब होते हैं तो जितना हो सकता है उतना अपने हिसाब से लोग एक दूसरे की मदद करते हैं।
पर सवाल उठता है उनके पास राशन कार्ड तो होगा? क्या गरीबी की रेखा के नीचे वाला राशन कार्ड नहीं था? या उस समय यह योजना नहीं थी? यह तो सब हम अनुमान लगा रहे हैं पर वास्तविकता क्या है? बात बहुत पुरानी हो चुकी है 1982 के बाद से तो मैंने देखा ही नहीं है किसी को ना अपने नानी का घर गया। कैसा है वह?

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