Govardhan Pooja or Go(vansh) vardhan pooja???

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गंगू दुलहिन

गंगू दुलहिन।
हां यही नाम था उनका। रेलवे गंज हरदोई सराय के पीछे वाली गली और उसके बगल वाली गली दोनों में वे ही काम करती थीं। हमारी नानी जी के घर पर भी वही काम करती थीं। कई बार घर की चौखट पर खड़े होकर उनको चाची चाची कहकर हमारी नानी को बुलाते हुए सुना था। मम्मी को जीजी कहती थी। लंबा इकहरा शरीर चेहरे पर चेचक के दाग, हंसते समय बड़े दांत दिख जाते थे। कई बार सोचता था उनका नाम गंगू दुल्हन क्यों है?
क्योंकि गंगू गंगा या गंगाराम की पत्नी थीं यानि की दुलहन थी गंगू की। इस मोहल्ले में वे ब्याहकर ऑईं थीं। इसलिए उनका नाम सारे मोहल्ले में गंगू दुलहिन पड़ गया और वह इसी नाम से जानी जाती थीं।
कई वर्षों के बाद गली में कुछ दूसरे प्रकार की रौनक थी। छम-छम ध्वनि करती हुई एक आकृति गली में बढ़ रही थी। घूंघट से मुंह ढका था और नई बात थी कि वह चप्पल पहने थी। नयी दुल्हन की तरह थोड़े गहने पहने हुए थे। पायल के घुंघरूओ की आवाज आरही थी।
गली में हर घर के पाखाने की सफाई कर रही थी। गली में दूसरी तरफ एक सुनार का घर था। उसकी पहली मंजिल पर झरोखे में लड़का खड़े होकर कुछ व्यंग कस रहा था। रामप्यारी कह करके कुछ बुला रहा था। कुछ दिनों के बाद पता चला कि यह गंगू दुल्हन की बहू है और नई शादी हो करके हाल ही में आई है इसका नाम ही रामप्यारी है। उसके हाथ में बड़ा सा नादी नुमा, बेत से बिनी हुई डलिया सी थी और एक औजार जो हमेशा रहता था। वह साइकिल के पहिए का कवर होता है उसको एक तरफ पतला करके और दूसरी तरफ से पकड़ने लायक घुमा कर बनाया हुआ हैंडल था। एक ना एक दिन वे सुनार के लड़के इस बहू को कुछ न कुछ कह कर छेडते रहते थे। चाहे देवर भाभी के रिश्ते से या फिर नवयुवक यौवन की दहलीज पर कदम रखते हुए एक कम वय की नवविवाहिता के नाते उसे लोलुप नजरो से देखते थे। हारकर रामप्यारी कई बार कुछ घरों की बुजुर्ग महिलाओं को बोल चुकी थी कि देखो बहुत दिक्कत है परेशान करत हैं। हमें नीक नाइ लागत है। परंतु मोहल्लेदारी या रिश्तेदारी के नाते लड़कों और इस नई नवेली बहू का रिश्ता देवर भौजाई का था इसलिए इस तरीके के छोटे-मोटे मजाक समाज में चलते रहते थे और लोग इस पर कोई ध्यान नही देते थे। आजकल होता पुलिस वगैरह शिकायत हो जाती।
बहुत छोटे पर जब हम लोग नानी के यहां जाते थे तब से गंगू दुल्हन को ही हमने पखाना साफ करते देखा था। हर घर में पखाना गली की तरफ ही खुलता था। कुछ के दरवाजे अच्छे बने होते थे और बड़े होते थे। बड़े घरों के पखाने बड़े होते थे उनमें बड़े दरवाजे थे। कमरा नुमा रहता था और कुछ घरों में तो बोरे का या पीपे की टिन का पर्दा पड़ा रहता था। और रोज ही अक्सर लोगों के बीच झगड़ा होता था। विषय यही रहता था कि उनका दरवाजा टूटा पड़ा है पखाना खुला है। अच्छा नहीं लगता है। बंद करो। ढंग का कुछ क्यों नहीं बना लेते। करें भी क्या? उस स्वच्छता कर्मियों की कॉलोनी के भुजंग सुअर गली में कई बार ताक लगाकर के सारे पखानों में हमला कर बैठते थे। और जरा सा भी मौका पाया पखानों के पल्ले ढीले मिले तो थोड़े टूटे हुए दरवाजों को तहस नहस कर डालते थे। बोरी के परदे और छोटी मोटी टिन के परदे उनके सामने टिकते नहीं थे। गली में दो-तीन बार यह विश्व युद्ध सा दृश्य दिखाई देता था। इसके बाद गली के सारे निवासियों में आपस में झडप होती थी और खूब कहा सुनी होती थी। यही कि हमारे घर के दरवाजे के सामने तुम्हारा पखाना पड़ता है इसलिए इसको बंद करके रखो अच्छा नहीं लगता। कोई आता जाता है तो अच्छा नहीं लगता है।
ऐसे माहौल में गंगू दुलहिन एक परमानेंट फिगर रहती थी। उनके बिना तो गली का काम ही नहीं चलता था। रोज सवेरे आना सफाई करना और फिर अगर समय हुआ तो घरों में जाकर के तगादा करना उलाहना देना कि इस महीने में कुछ नहीं मिला। पैसे नहीं मिले, कुछ भी नहीं मिला।
हमारे घर में आकर के नीचे चौखट पर खड़ी हो करके चाची चाची कह कर बुलाती थी। मेरी नानी की झरोखे से ही उनसे आपस में वार्तालाप होती रहती थी। हमारी नानी उन्हे कभी मना नहीं करती थी किसी बात के लिए। इसलिए गंगू दुल्हन अपनी चाची के पास आकर सभी तरह की बातें करलेती थी। और अगर कुछ मदद होती थी तो वह कैसे भी प्राप्त कर लेती थीं। पैसे या कपड़े या खाने का हो किसी भी तरह की मदद उसमें हम लोग कुछ भी नहीं कर पाते थे। बस दूर से ही सुनते थे और खुदही वे दोनों आपस में ही निपटारा कर लेती थी। हमारी नानी की एक परचून की दुकान भी थी।
गर्मियों की छुट्टियों में जब हम लोग जाते थे तो गली के कई लोग इसमें कुछ भुर्जी के परिवार, एक दो कसाई के परिवार, धोबी का परिवार और गंगू दुलहिन नानी के घर से कुएं का पानी लेने के लिए आ जाते थे। पता नही क्यूं। वे जब भी आती थीं, घर के बाहर से अंदर आने पर एक बरोठा था, आज की भाषा में बरामदा सा था, वे उसकी देहरी कभी पार नहीं करती थी। उन्होंने वह एक मर्यादा सी लक्ष्मण रेखा खीच रखी थी। जीवन पर्यंत यह मर्यादा निभाई।
कई बार ऐसे अवसर आए जब नानी जी की तबीयत खराब थी। या फिर कोई बहुत जरूरी काम था तब नानी जी ने उन्हें पहली मंजिल तक बुलाया। वह भी केवल जीना जहां खत्म होता है उस देहरी तक उसके पार कभी नहीं। पर यह कभी नही लगा कि यह चाची और उनकी भतीजी के बीच कोई अदृश्य रेखा थी। सीमा थी। या रिश्तो की डोर थी। जो कि दोनों तरफ से समान रुप से खींची हुई थी। उसका उन्होंने सदैव पालन किया। हम लोगों को गंगू दुल्हन का हमेशा से मुस्कुराता चेहरा ही दिखाई दिया। जो सदैव गरिमामयी पल्लू से ढका रहता था। गली के छोर पर एक घर था। गली में उसकी निकासी नहीं थी। गली के दूसरी तरफ दूसरी गली में उस घर का निकास द्वार था परंतु हमारी गली में उस घर में दो बड़े दरवाजे नुमा खिड़कियां थी। जब ईद या बकरीद या कोई शादी विवाह आदि कोई अवसर पड़ते थे तब हम लोग उन खिड़कियों की सांको में से झांक कर घर के अंदर देखने की चेष्टा करते थे। उसमे रेशमा रहतीं थीं। गर्मियों में रेशमा भी कुएं का पानी लेने आती थीं। वे भी देहरी के बाहर खड़े होकर के दरवाजे पर चाची चाची की गुहार लगाती थी। चाची(यानि कि हमारी नानी) पहली मंजिल वाले झरोखे पर आकर के उत्तर देती थी। तब पता चलता था कि रेशमा को कुएं का ठंडा पानी चाहिए। लोग शाय़द इसलिए आते थे कि उस कुएं का पानी ठण्डा और मीठा था। पर कुंए तो कई और घरों में भी थे? पर हमें लगता है कि नानी जी शायद ऐसी जरूरी चीजों के लिए मना नहीं करतीं थीं। और घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं था इसलिए समाज की सोच कि अकेली विधवा महिला है तो लड़ नहीं पाएंगी दूसरे घरों में पुरुष मालिक होते हैं और उनसे ही पूछ्ना पड़ेगा।
समय बदल चुका था। 1980 का समय था। समाज में बहुत बदलाव आ चुका था। तो हमारी नानी की तरफ से जो कि एक मकान मालकिन थी विधवा थी स्वरोजगार थी कभी भी इस बात के लिए किसी को पानी के लिए मना नहीं करा। हां सामाजिक लोकाचार अपनाते हुए किसी ना किसी से बोला जाता था कि पानी भर करके उनकी बाल्टी में डाल दो। कई बार तो दो एक किराएदार नाराज होने लगे पर नानी जी ने एक नही सुनी। करते भी तो क्या करते उनको घर बदलना पड़ता। पर बिना किराए के कौन उनको मकान देता।
उस सराय में भी एक बड़ा सा कुऑ था पर पता नहीं वहां वो लोग नहीं जाते थे। रेशमा के घर से कुछ कदमों पर ही सरांय थी। दो घर छोड़कर ही थी। और उनके धर्म व‌ बिरादरी के लोग थे शायद या फिर ‌रेशमा की जाती भी अपने समाज में आखरी छोर पर होगी।
हमार नानी के घर के कुएं काही पानी लेकर जाते थे, रोज नहीं, पर कभी कभार। फिर तो कालांतर में जबसे नगर निगम शुरू हुआ उनकी तरफ से नल की सुविधा होने लगी रेशमा और कमला मौसी के द्वार के पास में भी हैंडपंप था और बाद में फिर नलका भी लगा। तब तो किसी के घर जाने की किसी को जरुरत ही नहीं पड़ती थी। पर फिर भी गर्मियों में कुंए का ठण्डा पानी लेने वे लोग नानी के घर ही आते थे। परंतु सामाजिक संबंध और चाची और मौसी और जीजी आदि के संबोधन हमेशा जीवित रहते हैं। और आज भी हैं। उनको कभी भी नहीं तोड़ा जा सकता। यही हमारे समाज की रीढ़ थे आपसी भाईचारा। और स्त्रियों मोहल्ले की महिलाओं द्वारा‌ इसको शदियों से सहज कर रखा गया है अभी तक। इसको ही कह सकते हैं गंगा जमनी तहजी। और वह‌ सदैव जीवित है।

Buying a #Tata #Car? where to put grievance? @TataMotors

i have earlier written about why buying a car is a difficult process now i am writing why buying a car is a bad experience??? at least for me.
For more than 10 years i have waited to take a decision to buy a car, that too belonging to made in India concept.
I was glad when in 2008 a new car was brought out by tata motors, The Tata Nano?, Ratan Tata ji drove on to that stage and revealed it to the world. It was said to be the cheapest car in the world.
That day on wards i thought to put some money to buy this Tata Nano. Whenever I told at home that i want to buy tata nano that very moment a cold war started in my home. forcing me to delay my decision of buying tata nano.
now since i have met an accident and had a fall from scooter and got leg injury. ultimately decided to buy a car immediately. I asked someone in my office to send for dealer of tata motors in my city.
in evening a sales person of dealer of tata motors came to my home. he offered colourful brochure cars. it had attractive photographs of cars with lots of specification. most of those specifications are meaningless to me. To a novice, a first time buyers of a car like me or so to save i am illiterate in that field to know about those specification of a car.
As a common man only criteria is the cost of car that decides our choice. After few deliberation by that sales person we thought to select some but since i had an emergency requirement.  means i cannot wait as i have already injured my knee so unable to walk or drive scooter, i thought to buy a car so that at least i can drive or hire a driver for daily requirements, of taking my son to school, tuition and other house works requiring my wife to go to market and most importantly going to hospital.
While selecting colours we were stuck and also about the few specifications of car. He told that this colour is not available at present you have to wait for sometime if you want this colour or that particular car.
But due to my emergency requirement did not permit me to delay or wait for sometime. That means i do not have a window of waiting time. So we were forced or constraint to buy what was said to be in stock i repeat in stock. That salesperson told this car is in stock so we selected a chocolate brown colour. Inspire of our preferred colour was white. since we were informed that if you want to buy some other car on some other color then you have to wait for sometime, that was the statement given by sales executive. based on that and constraint of time and emergency requirement we opted for that particular Tiago xt of brown colour. we did not get any test drive? there was no request from our side to see the car? As every other customer goes to showroom and select car but in my case i was on medical treatment having leg injury and constraint of time, i mean i my requirement was of an emergency requirement so putting faith on the words of sales person that this car is available in stock with the dealer of tata motors i signed cheque for 3 lakhs and asked him to process a loan application for 2.40 lakhs.
After 2 days i was asked to come to the sbi bank and sign on various papers at various places that bank person told me. he had put tick marks at many places with pencil and i blindly signed without reading a single word on that fat bunch of papers. that was said to be my loan application. i could not wait for there and returned home.
I had told him that delivery time most preferably is Friday. I need car by Friday. On Saturday i went to the showrooms as i did not receive any phone call. So i went there on my own taking an auto rickshaw. Sales person told he do not have driver that day so he was unable to pick me from my home. that’s why i opted for auto rickshaw to reach showroom from there he drove me in a car to workshop. there he showed me one car that was of chocolate brown. there was another customers also who came to see that car. Thus it came out that particular car of brown colour standing in the workshop on Saturday 11th August was of that customer. sales person told me that your car is similar to this car. later when my son enquired about few things he told there will be no alloy wheels, there will be no viper etc etc. Then i stopped him told that i will not see this car you tell me when i can see my car. When you show my car then only my visit will be counted. this visit is not counted.
he said by Wednesday your car will be in workshop.
i returned home and waited for their phone call but it never came. then i asked on Thursday he said i don’t have a vehicle to come to you then i asked you don’t have a motorcycle or anything he said no, i will come tomorrow.
after that i did not receive any phone call for 2 days when i phoned on Friday he told there is some delay then all my patience went away. i could not hold myself.
on Saturday i went to the showroom and inquired about the manager. staff present there told me, manager has gone outside and that particular salesperson is also not in the showroom. then i asked whom shall talk to about my problem. i was promised the car by Friday but it did not happen. so where to put my grievance. While i was shouting crying and telling my problem to staff present there who all seemed to be alien that very time phone call came from the sales person he told there is a delay in arriving of the car? i said i was told that car was in stock? that’s why we were constraint to select that particular car. Otherwise if we were informed that day that this car is also not in stock then i would have chosen any other car. As there was no waiting time for me thus we had selected this car Tiago. Purely due to emergency requirement. now i am told that you have to wait. that means the person told me wrong information. He gave me wrong information. he then told in stock means that car is in transition. i told that i have studied till msc or post graduation and you need not to tell me what is meaning of in stock????
He kept on telling me what is the meaning of in-stock. I said don’t tell me that technical term used car. You told that car is in stock so i gave you money without seeing the car, without having any test drive. only based on this statement that car is in stock and by one week i will get the keys of car, and it should be delivered in my home on Friday based on that i gave the money.
now he began to give me more excuses later on i talked to manager also i told him all that happened with me.
i don’t know what was going on in his mind. he later told that it is very difficult. i said if i am suppose to wait for this car i could have waited for another car also?
had i been told that car is not available i could have opted for another car or another colour. Since i was told that car is in stock so i selected this car. what is my fault? he said no since chasis number is allotted in your name.
consignment is a allotted to your name.
so many excuses he started telling. i told i don’t want this car, give me the Tigor XT and i told I will pay the additional amount. he said there was some miss miscommunication and that salesperson did not tell me this. otherwise i could ever stopped your cheque, so that by the time car comes we would have happily given this car. One car was standing in his showroom. he said he could have sold this car. Sales person could have told me the correct thing.
I said what is the option? i don’t want this Tiago and you give me Tigor XT. I said tell me how much more money you want i’m ready to give. he told that it costs 6.60 lakh. I said i am ready to pay.
he said no, no it is not possible, once car is booked in your name, it cannot be changed.
I said my only complain is that i was not told the correct situation that car is not in-stock.
Sales person told me car was in-stock so i purchaseed.
Now i am not in possession of any car? despite of waiting for so many days. Since 10th August i am waiting waiting and waiting .
I was supposed to get car by 17th August, now it is already 22 August.
Now what is the use of waiting?
God knows why i chose to buy Tata Car?
It would have been better to opt for any other car. Either Maruti or Ford?
considering my idea, that i should buy a made in india car and after waiting from 2008 to buy a tata Nano, i decided in 2018 to buy a tata car.
now i got this bad experience. now i think i have been cheated. and i don’t know what is in future????
I told that you cancel that loan application. Manager told that it will cost you, there will be loss of money. i said okay i can sustain that cost, but change the car. He said there will be problem. i said ok you give away this car(Tiago XT) to any other customer. and give me Tigor XT.
because neither of the cars are in station and i have been kept on waiting forcefully and at not my fault.
it was fault of sales person. But they are not listening? what to do? Where to put my grievance? any one listening in Tata Motors

Old charming days of Indian Art: #Calendars on #Mythology

During Childhood i used to watch our elders, grandparents performing Pooja. There were few dedicated places in homes. In some houses there used to be room called as pooja room. in others only a section of room or almirah are designated as pooja corners. On the walls of rooms were hanging many beautifull calendars depicting Lord Shiva, Parwati, Shri Ram and Sita. Most common was Ram Durbar. there many more of Ganga Avataran, Maa Sarswati etc. Sache Darbar ki jai echoed few times. there was this calendar depicting Shri Ram Sita, Laxman, Hanuman etc full of many men in Ayodhya Darbar of Raja Ram.  That was in 1970s & 80s. But as i am living in 2018 with social media all around me, strangely i am turning my head all around to see if i can find any of those beautifull calenders? Sadly i have none of those pictures. Since almost all of those calendars were on paper, they degraded/ torn and later were immersed in flowing rivers.

Now a days in the age of science and social media we have lost such heritage of Art.

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Marriage procession of Lord Shiva and Goddess Parvati
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Satyanarayan- mostly was used when we performed satyanarayan Katha?

Usually, we had this pooja called Satyanarayan ki Katha. That time this picture was placed on a small table decorated with plantain leaves, and table top is decorated with flowers, grains-Rice, a pot filled with water, and covered by Mango leaves. A purohit or pandit ji would come and start a never ending katha(story) that time it was never ending as felt by a child? But eventually it would end and we get to eat fruits, Panjeeri etc. But in between eyes would b full of tears from the smoke coming out from pire of fire of Yajna (Yagya)

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Ardhnarishwar

there was time when mythology inspired the Art of painting. Many miniature paintings were mostly inspired by Mythology. miniature paintings were not for common man during medieval times. It was an art for rich, kings and nobles or businessmen. In Bengal School of Arts few artists painted miniature inspired painting. They had local subjects and craft is from Folk traditions.

Paintings of Raja Ravi Verma were inspired from mythology too, but the technic of Oil paintings was European.

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birth of Shakuntala- why she was illegitimate child? 

This painting(above), I think is of Raja Ravi Verma style. Though Painting is beautifull but the subject is very saddening. The sage shown here is disowning the girl child born only due to him. As a rishi he was supposed to do Tapasya(learning with hardships) but he lost control and had an sexual alliance with this apsara Menaka. This unsafe sexual act bore a child. that might or must have been accepted by both parents. unfortunately she was orphaned. Later renamed as Shakuntala. That rishi(sage) was solely responsible for birth of that girl child. I dont know whether God punished him or not?

 

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Lord Shri Ram & Sita, since Hanuman is there!!
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Shiva family
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Lord Shiv Parvati Vivha- marriage of Goddess Parvati and Lord Shiv
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Lord Shiv and Parvati Vivah
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Lord Shiv Parvati family
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Shiv parivar
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Vishnu Laxmi and Shiv Parvati
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Ganesh is welcomed home
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Rajyabhishekh of Raja Ram

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Radha Madhav, Radha Krishna
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is it vishnu?

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GajaLakshmi, Raja Ravi Verma style

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This above is a beautifully framed picture of Shri Ram Durbar or panchayat as mentioned in that photo. Earlier such photo frames were common features in our homes, hanging in tilted form from a nail in walls.

Later when i saw a fat old magazine(Kalyan) kept in the almirah in the pooja room, i was surprised to see many such beautifull paintings on our Indian traditions.

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Kartkeya

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रमेश हलवाई Ramesh Halwai?

रमेश हलवाई
रेलवे गंज हरदोई के उस मोहल्ले में मेरी नानी का मकान था। वहां पर एक किरायेदार रहते थे उनका नाम था रमेश। जब हम छोटे थे 1971 में मांटेसरी स्कूल में पढ़ते थे कक्षा चार में। तब अक्सर रेलवे स्टेशन की तरफ चले जाते थे। उस को बोलते थे रेलवे फाटक वाली रोड। रेलवेस्टेशन तो दूसरी रोड पर पड़ता था। इस रोड को मोहलिया जाने वाली रोड कहते थे। फाटक के पास कुछ दुकाने थीं उनमें से एक दुकान रमेश की थी। अक्सर जब जाते थे तब उसमें कुछ मिठाई पेड़ा समोसा आदि मिलते थे।

कई वर्ष उपरांत जब हम लोग कानपुर रहने लगे तब कभी-कभार छुट्टियों में ही जाने का अवसर मिलता था। जब फाटक वाली रोड पर पहुंचे तो देखा रमेश की दुकान थोड़ी उजड़ी उजड़ी दिख रही थी। ना तो उसमें रौनक थी न मिठाइयां दिख रही थी। कुछ एक टूटी-फूटी अलमारी जिसमें कांच लगे हुए थे पुरानी अलमारी थी। एक कोने में उनका लड़का बैठा था। क्योंकि लड़का बड़ा हो रहा था 10 या 11 साल का हो गया था लिहाजा उसे भी पिता का हाथ बटाना था। थोड़ी समोसे आदि पकौड़ी जैसी कोई चीज बिक रही थी।

साल भर बाद गए तो पता चला घर में ही आंगन में उनकी पत्नी और लड़कियां समोसा आदि बना रहे थे। आश्चर्य हुआ कि कुछ समय में इनका रहने का स्तर कैसे इतना गिर गया? छोटे पर तो होश नहीं था पर इतना पता चला था कि रमेश दुलहिन एक किसी बड़े प्रतिष्ठित हलवाई की पुत्री थीं। उन हलवाई की दो या तीन ही लड़कियां ही थी कोई पुत्र नहीं था। हरदोई शहर में और लड़कियां रहती थी आपस में उनका बनता नहीं था। पिता का जो धन जायदाद थी इन तीन चार बहनों में ही बट चुकी थी। पहले तो इनका घर ठीक ठाक दिखता था। हम इनके घर में जाते थे। बड़ी लड़की का नाम था अबलेश कमलेश हमारा नाम था। छोटी बहन का नाम मिथिलेश था। लड़के का लड़के का नाम मुझे याद नहीं है। एक और छोटी सी लड़की थी। याह तो मुझे पता दो या तीन बच्चों का जन्म तो हमारे सामने ही उसी घर में हुआ था। उस समय पता नहीं क्यों अस्पताल नहीं जाते थे बच्चे के जन्म के लिए। जचकी घर में ही हो जाती थी कई बार दाई आ जाती क ई बार नहीं। नानी के मोहल्ला में मैंने कम से कम लगभग हर घर में जन्म घर में ही होते देखा है। परंतु हमारी बहन का जन्म हरदोई अस्पताल में हुआ था। अब इसको अज्ञानता अनभिज्ञता कहें या फिर अभाव? संसाधनों का अभाव जिसकी वजह से लोग हस्पताल अस्पताल नहीं जा पाते हैं बच्चे का जन्म कराने के लिए। हो सकता है की गरीबी या संसाधन की कमी! आर्थिक रुप से कमजोरी ही एक बड़ा कारण हो जिससे कि लोग जन्म के लिए मां को अस्पताल नहीं ले जा पाते?

बात हम बता रहे थे कि कैसे उस घर का आर्थिक संतुलन बिगड़ गया। एक दो बार मैंने उनको बोला था कि आप अपना खाता खोल लीजिए पासबुक अपने पास रखिए। बैंक में जाइए और चुपचाप पैसे डाल लिया करिए हर महीना किसी को पता ही नहीं चलेगा। तो वह हंसती थी मेरे ऊपर। तो मुझे पता नहीं था उसके पीछे क्या कारण था। चूंकि मैं नानी के साथ हिन्दुस्तान कामर्शियल बैंक जाता था पासबुक भी देखी थी इसलिए मैंने उनसे भी यही करने को कहा था।
कुछ वर्षों के अंतराल में मैंने देखा वह कई बार ऊपर आती थी नानी से कुछ पैसे उधार मांगती थीं चुपचाप जिससे किसी को पता न चले। कभी दो रुपया या पांच रुपया। आज रुपया भी कोई रुपए होते उधार मांगने के लिए। पर उस समय में उनके कमरे का किराया लगभग ₹15 या २५ ₹ था।
फिर अगली साल हम गए तो पता चला बड़ी बेटी को टीबी हो गई। मुझे तो विश्वास न हुआ। कैसे हो गई इसका कुछ पता नहीं चला। कि डॉक्टर को दिखाया या नहीं यह भी नहीं पता चला। जिस घर में बच्चे के जन्म के समय मां को अस्पताल ना ले जा सके उस घर में हम क्या आशा कर सकते कि वो बच्चों को डॉक्टर को दिखाएगा? कैसे दिखाएगा? और वह भी चार बच्चे?
फिर अगले वर्ष पता चला अबलेश की मृत्यु हो गई। अब मिथलेश बड़ी हो गई। उसकी छोटी बहन भी काम काज करने लगी। लड़का बिगड़ गया घर से भागा रहता था। और यह सब हुआ दो तीन साल में। मैंने सुना रमेश बहुत शराब के आदी हो गए थे और शायद जुंआं भी खेलते थे। रात बिरात आने जाने का कोई समय नहीं था उनका। करते-करते घर की हालत खराब हो गई। घर के आंगन में ही रमेशदुलहिन चूल्हा जलाकर जो सामान आ जाता उससे इमली की चटनी टमाटर की चटनी समोसा कचोरी कुछ इस प्रकार की चीजें बना देती फिर वे सब चीजें दुकान जाती। दुकान से जो बीक कर आता होगा या नहीं आता होगा उसमें पूरा घर गुजारा करता। एक मां तीन बच्चे शराबी पति पता नहीं कैसे गुजारा करते थे। एक साल जब गया तो देखा कि उनके चश्मा लग गया था अब उसमें से भी उनको दिखता था कि नहीं दिखता था। हर साल जाने से ऐसा लगता जैसे वह चश्मे को हिला हिला के प्रयास करती देखती आगे बढ़ती और घर का सारा काम करती। कौन जानता है कि उस चश्मे से उनको दिखाई देता था या नहीं? आंख दिखाने के लिए चश्मा बनवाने के लिए वे कहां जाती? और फिर वे अपनी पीड़ा किसको बतातीं? उस समय कोई घर-घर जाकर लोगों को अस्पताल वाले तो नहीं देखते थे? हम तो छोटे थे क्या बहाना बनाएं? ऊपर से देखते मन मसोस कर रह जाता। खाने-पीने की चीजों से ही मदद कर पाता था।
दीपावली आई। मैंने देखा आंगन में ही रमेश ने शक्कर की बतासे बनाने शुरू करे। शक्कर के खिलौने बनाए। वहां पर ही मैंने देखा कि कैसे छोटे और बड़े कई तरीके की शक्कर के बतासे बनाए जाते हैं कैसे शक्कर के खिलौने बनाए जाते हैं।
हो सकता है कि वो एक मंझे हुए हलवाई रहे होंगे उनको हलवाई की क्राफ्ट आती थी हलवाई गुण आता था इसलिए उनके पास हुनर कला तो थी परंतु पता नहीं क्यों उनको सफलता वह नहीं मिल पा रही थी? बिजनेस फेल होगया था। मार्किट ने अपने को जमा नहीं पा रहे थे। नानी क्योंकि मकान मालिक थीं इसलिए कई बार गुस्सा भी हुई थी कि आंगन में लाकर के सामान और भट्टी और तरह-तरह जो उपकरण इस्तेमाल करते हैं जिससे कि मकान को भी छति पहुंचती है और अगल बगल के रिश्तेदार भी शिकायत दर्ज करवाते हैं कि उनको असुविधा होती है। गरीब परिवार था इसलिए शायद नानीजी चुप रह जाती थी। सुन लेती थी। परंतु बहुत ही कठिन जीवन था उन लोगों का।
हम तो उनको मामी कहते थे। जब भी ऊपर मिलने आती थी नानी से उनके चेहरे पर एक सीमित मुस्कान ही रहती थी। जो कि एक आवरण ही होती थी। मुझे पता थी यह बात। हम तो एक महीना या 20 दिन के लिए ही छुट्टियों में जाते थे परंतु देख तो लेते थे उनकी हालत।
धीरे-धीरे उनके सारे अच्छे वस्त्र छूट गए साज सिंगार सब छूट गया हाथ के कंगन बिछिया मांग बेंदा गले का हार कान की बालियां कुंडल जो भी स्त्रीयोचित श्रृंगार की चीजें थी वो सबसे दूर हो गई थीं। यहां तक कि लगता वह स्नान भी नहीं करती थी रोज। नहीं कर पाती थी साबुन कहां से आएगा? रोज शरीर को और कपड़े धोने के लिए? बरतन कढ़ाई वगैरह धोना तो मजबूरी थी क्योंकि दूसरे दिन उसमे उनको फिर बनाना था।
हम देखते थे कि उस घर में खाना नहीं था पेट भर कर। पर बच्चियां और मां समोसा चटनी और तरह-तरह के चीजें बनाती थी पर मजाल कि उनमें से चख भी लें। हलवाई की पुत्री थीं और शायद जानती थीं बिजनेस के उसूलों को? झूठा नहीं करना चाहिए? या फिर पुरुष का भर।
पर मैंने जहां तक देखा है कि बच्चे और मां अक्सर भूखे ही‌ रह जाते थे। हम लोग जब बारहवी में आ गए उसके बाद पढाई में इतने व्यस्त हो गए कि कई वर्षों तक हरदोई जाना नहीं हुआ। कई वर्षों के बाद देखा पूरा घर सूनसान हो गया था जसे उसमें कोई रहता ही नहीं था। पता चला सब लोग चले गए। किसी की मौत हो गई। किसी का क्या हुआ कोई बताने वाला भी नहीं था। लड़का कभी कभार आता था एक दो बार पर रमेश का कुछ पता नहीं चला।
दुख लगता है कि एक कैसे एक कर्मठ परिवार पूरा खत्म हो गया। शायद आर्थिक कमजोरी के कारण या फिर हमारे सरकारी सामाजिक सुविधाओं को जरुरतमंद तक ना पहुंच पाने के कारण। जन सुविधाओं को जनता तक या गरीब तक ना पहुंच पाना?
या फिर समाज के रूप में विफल होना?
बीमारी और दवाई में लोग ज्यादा मदद नहीं कर पाते हैं। खाना तो आस पड़ोस से मिल जाता है परंतु बार-बार अस्पताल जाना, डॉक्टरों की फीस, दवाइयों का खर्च, आदि थोड़ा कठिन हो जाता है दूसरों के लिए।
जहां तक मैंने देखा है क्योंकि लोग आस पड़ोस के खुद भी गरीब होते हैं तो जितना हो सकता है उतना अपने हिसाब से लोग एक दूसरे की मदद करते हैं।
पर सवाल उठता है उनके पास राशन कार्ड तो होगा? क्या गरीबी की रेखा के नीचे वाला राशन कार्ड नहीं था? या उस समय यह योजना नहीं थी? यह तो सब हम अनुमान लगा रहे हैं पर वास्तविकता क्या है? बात बहुत पुरानी हो चुकी है 1982 के बाद से तो मैंने देखा ही नहीं है किसी को ना अपने नानी का घर गया। कैसा है वह?