Panna Dhai पन्ना धाय the name synonymous to loyality

On #MothersDay i thought to dedicate it in name of Panna Dhai, we respect her as a Mother. Great sacrifice she did? She is a respected symbol of Mother.

Swayamkatha

पन्ना धाय Panna Dhai .does this name sounds familiar to you?  Just uttering this name “Panna” resonates within us what we call as Passion, love, duty, the greatest बलिदान BALIDAAN sacrifice! (In English, I don’t find good words equivalent to words of Hindi? May be due to my education?). 
Thus without going into dictionary, the word Panna is now has a meaning in our mind. This word does not need any dictionary in India… If one thinks that he or she belongs to India (Am I saying anything wrong ? any way we live in a democracy.  that means we are happy to disagree with thought of others-read fellow citizen) Panna means Panna, no other definition. 
The highest form of कर्तव्य duty, balidaan, faithfulness loyality. All embodied into one spirit which is known as Panna Dhai. The dhai maa of Uday Singh ji of Mewar.
If you are on this side of River Sindhu (Indus) then…

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#Ballet #Dance #MaleDancer #MenWhoDance

another ballet pose

another dual
https://pin.it/5nqfwpa5amxxtp

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ghuinya? #root #vegetables can also be a good option: #Traditional #dishes

Swayamkatha

While preparing the vegetables for sambhar or sambar I got the idea shall i use any root vegetable in this sambar? Since sambar is a traditional dish of South India. i thought whether they use any of the root vegetable in it or not? Though carrot, radish, turnip, beet root can be considered as root vegetables. these all I use in sambar.   There are other root vegetables such as Potato, Sweet Potato. these also i use in sambar. I call sambar as the kichidi खिचड़ी of vegetables. 

There are many root vegetables as i know them by names such as घुइंया banda बोंडा। I dont know their names in English? But they look like this:- Is it also called Taro? There are many vegetables which we can consider as root? Only problem I have with these Ghuiyan and banda is that my throat gets irritation after eating it. Thus…

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#Floating #Lab for Floating #Islands; #Loktak #Lake

Swayamkatha

Floating Islands I have heard. But have you heard floating laboratory? earlier i had written about Loktak lake- click to read it What is common between a #deer and #dance? #Manipur

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If a report in The Hindu of March 18, 2018 on page 9 of Jacob Koshy, is to be believed then a floating laboratory three days a week, four women in white lab coats traverse the Loktak Lake of Imphal in a motorboat, Scooping flaskfuls of water for analysis.

Changes in temperature is recorded, conductivity and dissolved-oxygen in 300 sq km lake. As it happens everywhere on earth the rising urbanization and land use change over the years has seen the Loktak Lake become a dump yard for municipal waste.

I don’t blame people of Imphal, since this commercial attitude and ignorance about risks of environmental degradation is rampant all over our country.

Chennai floods is most…

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why they named it as #Indus #DanceGirl? #Harappa #IndusValley #civilization? — Swayamkatha

Dancing girl in National Museum N Delhi Many of us must be aware of this figure, nick named as Dancing girl of Harappa/Mohenjo-daro, found in 2500 BC old Indus River valley civilization. Sindhu River. It has become world famous idol. People are researching over iconography etc things on this. But For me, I was amazed, […]

via #Dance #DanceGirl, why they named it as #Indus Dance Girl? of #Harappa #IndusValley #civilization? — Swayamkatha

हमारी कमला मौसी

हमारी कमला मौसी।
स्कूल की छुट्टियों में हम लोग हरदोई नानी जी के घर जाते थे। रेलवे गंज मोहल्ले में नानी जी का घर था वही पर रहती थीं हमारी कमला मौसी। ऐसा लगता है कि आंख खुलने के पहले से ही उन्हें हम जानते थे पहचानते थे। गली में आखिरी घर उनका था। जहां पर सराय का रास्ता आकर मिलता था उनके दरवाजे के पास में तीन रास्ते मिलते थे। कोने में एक भडभूंजा था। सर्दियों के दिनों में वह अनगिनत लोगों की दिनचर्या का केंद्र बन जाता था। लोग शायद खुद ऐसा कभी कहते नहीं थे ना ही मानते थे। पर कई लोग आगी लेने आते थे कई लोग बीडी चिलम या हुक्का सुलगाने आ जाते थे और लगे हाथ तंबाकू पर भी हाथ साफ कर जाते थे। कुछ लोग तो खाली रेत ही ले जाते थे। और जैसा कि बताया कि मौसम ही सर्दी का था तो आग से ताप मिलने की चाह में ही लोग आकर बैठ जाते थे। लगातार कुछ न कुछ भूना जाता था उस भाड़ में। वहां पर बैठकर उनको देखते थे कि कैसे धान की भूसी या पयार भाड़ में झोंक दिया जाता था। सब कुछ उस भट्टी में जल उठता था। आग की लपट हमारी तरफ गुस्से से दौड़ पडती थी। फिर थोड़ी देर में भूसी के कई प्रकार के रंग दिखते थे। कुछ जल कर राख बन चुकते थे वे काले रंग के हो जाते थे। कहीं लाल रंग कहीं काला कहीं स्लेटी कहीं नीला उस भट्टी में हमें कई अनजाने रंग भरे दिखते थे। उसकी दीवारों की मिट्टी जलकर पक गई थी। जो कहीं नीला रंग लिए हुए काली प्रतीत होती थी कही आग से लाल दिवाल दिखती थी। एक लंबा सा हाथा था चौके मे जो दाल परसे के लिए होता है उससे सौ गुना बड़ा लोहे का चमचा सा होता है। इतना भारी कि हम आराम से नहीं उठा पाते थे। भट्टी के ऊपर दोनो ओर कतारों मे कई ढक्कन नुमा टुकड़े रखें होते थे। लंबे हाथों से वे ढक्कन को हटाती थी तो उसके पीछे गड्ढा गगरी नुमा होता था उसमें रेत भरी रहती थी। उसमे से बड़े हाथे से रेत भरकर उनके सामने जो एक नाद सी जगह बनी थी उसमें रेत डाल देती थीं। उस बड़ी नादी के ऊपर एक बडी सी छलनी चलनी रखी थी उस पर गिरा देती थी। सारी रेत उस नादी में गिर जाती थी। अब जितना नाज या चबेना भूनना होता था उस मात्रा मे उस नाद मे डाला जाता था। हाथ से दो तीन बार रेत के साथ नाद मे चलाया जाता था। चटर पटर आवाजें उठती थी। चबेेना उस नाद मे धमाचौकडी मचाते उछलकूद करने लगते थे। उस नाद को छन्नी पर पलट दिया जाता था। रेत छन कर नाद मे गिर जाती थी। और ऊपर गरम गरम महकता हुआ ताजा चबेना मिल जाता था। unlike modern people know the popcorn making in present times.
गड्ढे में रखा रहता था एक तसला उसमे चना, मूंगफली, जुण्डी, मक्का या जो भी भूना जाता था उसमे रखा जाता था ग्राहक के लाए पात्र में डाल देती थी। इसके बाद मोल भाव होता था इतने पैसे पडेेेेगे । तो वह कुछ बोलती। इस पर कहा जाता इतने तो बहुत ज्यादा है इतने ले लो। या फिर उसका जलन लेलो। पैसे की जगह आनाज के रूप मे मजूरी चुकाने को जलन कहा जाता था। जलन अनाज के रूप में काट ली जाती थी।
उसके बाद उस बड़ी नाद की रेत क्योंकि अब ठंडी हो चुकी होती थी उसे वापस उन रहस्यमयी गगरीयो में दुबारा भरी जाती थी। फिर एक बार भूसी झोंकी जाती थी। अग्नि प्रज्वलित करने की प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती थी। क्योंकि गर्म रेत लगातार चाहिए थी। क्योंकि ग्राहकों की मांग कभी खत्म नहीं होती थी। मौसा जी तो बहुत बार आराम करने तथा शरीर को सीधा करने का बहाना ले कर चले जाते थे परंतु बेचारी कमला मौसी को ऐसी कोई सुविधा नहीं थी ना ही उन्हें यह अधिकार ही था शायद। मौसा जी को चाय देना, बीड़ी जला करके देना, पानी और खाना सब तथा अपने बच्चों की फरमाइश को भी पूरा करना पड़ता था इन सब के बावजूद हम सब बच्चों की टोली का हर ख्याल रखना एक अश्वमेघ यज्ञ से कम नहीं था। जब हम सारे बच्चे नानी जी के यहां जाते थे मौसी की ढुढाई शुरु हो जाती थी। कई बार उनके घर संदेशा पहुंच जाता था। कई बार हम लोग भी एक दो चक्कर लगाते थे। उनके आते ही हमारे मुंह में पानी भर जाता था। ढेरों फरमाइश दौड़ पढ़ती थी। मौसी मेरे लिए खूब भुने आलू और साथ में नमक, मौसी मेरे लिए आलू के साथ लाल चटनी खूब ढेर सारी लाना। मौसी मूंगफली आदि तरह-तरह की फरमाइश शुरु हो जाती थी। मौसी हंसती हुई सबकी सुनती। साल छह महीने बाद जो हम लोग मिलते हैं। मौसी अपनी चाची तथा जीजी यानी बहन से बातें करती। हमारी नानी को मौसी चाची संबोधित करती थी तथा मम्मी को जिज्जी। मम्मी कुछ रुपए देती और कुछ समय बाद ढेर सारे भुने हुए आलू, लाल चटनी आ जाती।
उनकी बनाई हुई लाल चटनी जीवन भर याद रहेगी। उनके हाथों मे जादू था। लाल मिर्ची जीरा खड़ा नमक और पता नहीं क्या क्या डालती थीं। सिल बटना उनके आँगन मे रखा था मैने देखा था वे उसपर पीसती थी। स्वादिष्ट मसालेदार तीखी लाल चटनी हमारे घर आती थी तो सभी लोग एक साथ टूट पड़ते थे। ऐसा लगता था कि हम लोगों के लिए तो जैसे और कुछ खाना नाम की चीज ही नहीं थी। उन दिनों कभी भुने आलू या भुनी हुई शकरकंदी, भुनी मूंगफली, चना चबेना आदि लाती रहती थी मौसी।
एक बार कमला मौसी घर मे आरही थीं सीढी चढ कर जैसे ही कुएँ वाली छत पर मुडकर आगे बढी उस समय ही ऐक पत्थर जो बिल्ली को भगाने के लिए हममे से ऐक ने फेका था वह सीधा मौसी की टाँग पर लगा। मुझे याद है कि उस जगह केवल सफेद रंग दिख रहा था। वह उनकी पैर की हड्डी थी। अब यह नही याद है कि उसके बाद क्या हुआ। कैसे उनका इलाज हुआ होगा? आजकल हमलोग किसी अपने को कुछ हो जाता है तो कैसे दौड़ भाग करते हैं। मौसी ने कैसे अपने आप को सम्भाला होगा इसकी आज हम लेस मात्र कलपना भी नही करते सकते। there was no hospital nearby, no auto, taxi or bus etc. Only means of transport was a rickshaw cycle or तांगा।
उनकी एक बड़ी पुत्री और एक छोटी पुत्री शायद थी। शीला और सुशीला। एक पुत्र था जिसको हम लोग सिल्लू कहकर पुकारते थे। कुछ वर्षों के बाद उनके पति की अकाल मृत्यु हो गयी। पता चला पेट में कांच की बोतल घुस गई उस वजह से मृत्यु हो गई। उसके बाद तो जैसे मौसी पर अकाल आ गया। मौसी का सारा श्रंगार छूट गया। खुले खुले बाल। उन्हें पल्लू से ढकने की चेष्टा करती

भाड़ जलना कम हो गया था। लागत ज्यादा आती होगी शायद। धान की फैक्ट्री से भूसी भरकर लाना शायद दुष्कर कार्य था वो भी एक अकेली विधवा महिला के लिए। घर छोटा था कभी कभार पड़ोसी परिवार भाड़ चलाता था अब हमको यह अंदाजा नहीं है कि वे लोग कितनी आर्थिक मदद करते होंगे पर कई बार ऐसी प्रथा भी होती है कि कुछ परिवार मिलकर भाड़ बनाते हैं और बारी-बारी से चलाते हैं।
जब नानी कानपुर आती थी तो उनका राशन कार्ड मौसी जी के पास ही रहता था इस जरा से सहयोग से कमला मौसी की थोड़ी सहायता शायद हो जाती होगी। बड़ी कोई मदद हम कभी नहीं कर पाए। परंतु उनका अभी तक निश्छल प्रेम हमको सदैव मिलता रहा था। सारे पारिवारिक समारोह उपलक्ष कार्यक्रम आदि में मौसी सदैव शामिल हुई है। उनके बिना घर के कई कार्य विशेषकर शादी व्याह के समय पूरा होना मेरे हिसाब से तो असंभव ही था। पारिवारिक आयोजनों के समय में घरों में कई तरीके के कार्य हो जाते हैं जिनको केवल और केवल कमला मौसी ही कर सकती थी। अब मन करता है कि हरदोई जाऊं उनके चरण स्पर्श करूं। लगभग 20-25 वर्षो से हरदोई नहीं गया हूं। 1997 में मेरे विवाह पर कमला मौसी आईं थीं। बाल लगभग पूरे सफेद हो गए थे। मेरा एक पुत्र भी हो गया है परंतु मैं चाहता हूं कि मेरा पुत्र मेरी कमला मौसी की इस याद को समझे। या जो छवि मेरे मन मे है वह उसे समझे। एक बार देखे\

मेरा ऐसा मानना है कि हो सके तो मेरा पुत्र उनके परिवार के लिए कुछ करे। कितना स्वार्थी हूं। मैने कई बार प्रयास किया जब गया हरदोई पर एक अजीब सा कष्ट मन मे होता था कहां उनका विशाल निश्छल प्रेम और अब मैं उसके ऐवज में कुछ आर्थिक रुप से सहायता करने की इच्छा करता हूं तो अपने आप को उनके चरणों के सामने बहुत छोटा पाता हूं। अब तो प्रत्यक्ष रुप से करने की कुछ हिम्मत नहीं रह गई है।
हमारी नानी जो कि एक ब्राम्हण परिवार से थीं तथा कमला मोसी एक भुर्जी परिवार से थी परंतु दोनों में प्रगाढता थी। अब हम लोगों का हरदोई आना जाना बंद सा हो गया है परंतु कुछ सामाजिक बंधनों रिश्तो की सुगंध यदा कदा विवाह आदि पारिवारिक आयोजन में खींच ले जाती है और इस तरह उन पुराने समय की यादें ताजा हो जाती है। पापा-मम्मी कई आयोजन में जाते हैं और हम लोग उनसे ही पूछ लेते हैं कि फलाने मामा कैसे हैं? मौसी कैसी है? आदि आदि। परंतु उनके लिए तो वह सब उनका एक कुनबा सा है उस कुनबे में कमला मौसी एक अभिन्न अंग है। उनका पुत्र होने के नाते मैं भी कमला मौसी को अपने परिवार का ही एक हिस्सा मानता हूं। ईश्वर कमला मौसी को अमर रखें।