A Legend Passes Away: #Mrinalini #Mukherjee #expressionist??

I read about her : Smt Mrinalini Mukherji in Magazine Dharmayug almost 30 years back. Few of her extraordinary creations were published. Could not believe my eyes what i saw back then. But when i got the chance to see her creations in the Bharat Bhavan Bhopal, then only i could believe. Seeing is Believing it is said. Yes. There were huge installations all woven like sweaters are done? She was great expressionist and most imaginative?

TateEtc41_Artwork-FINAL.inddTT_feature4van raja NGMAVruksha Nat NGMA The VanRaja was the famous ceration, where she might have thought to highlight the plight of Forest?

State of the Art

Rashmi Rajgopal tries rebuilding the image of  the artist and sculptor and asks readers to add in their pieces as well

How do you create an image of someone you have never met before in your life? Instinct would drive you to read about this person, or speak with people who knew her. But if you’re looking for something more impactful, simply attend a memorial service being held for that person.

On Friday, February 6, visitors flooded the National Gallery of Modern Art in New Delhi in remembrance of acclaimed artist and sculptor Mrinalini Mukherjee. The NGMA, currently holding a retrospective titled “Transfigurations: The Sculpture of Mrinalini Mukherjee”, held a memorial service for the artist who, aged 65, had succumbed to a prolonged lung problem last Monday. Among those who spoke fondly of her were Professor Rajeev Lochan, director of the NGMA; Peter Nagy, curator of the ongoing retrospective; critic Geeta…

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इंजीनियर साहब के जूते Engineer’s shoe

Swayamkatha

इंजीनियर साहब के जूते हां यही है इंजीनियर के जूते  20170728_133438

सुबह जब हम ऑफिस जाने के लिए उतरते हैं तो यह जूते यहीं पर रखे दिखाई देते हैं

कई बार तो इनकी चमक देखकर अपने जूतों की तरफ देखना पड़ता है कि कहीं हमारे जूते सही हैं कि नहीं और अक्सर ऐसा होता है कि हमारे जूतों की चमक इन से 19 होती है

हमारी बिल्डिग मे तीन मंजिल है भूतल उसके बाद प्रथम तल और द्वितीय तल या फिर कहे की तीसरी मंजिल पर हम रहते हैं जब हम उतरते या चढ़ते हैं तो इस ही जीना से सीढ़ी से उतरना पड़ता है

दोपहर को जब दफ्तर से घर खाना खाने आते हैं तो चढ़ने के समय भी इन के दर्शन हो जाते हैं चाहे हम 1:00 बजे आए या डेढ़ बजे पर यह जूते पहले से ही यहीं पर डटे मिलते हैं    जब 2:00 बजे दो ढाई बजे…

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बड़े साहब IAS

घर के सामने एक गाड़ी गली में खड़ी हुई थी उसपर लिखा था जिला प्रशासन। कुछ मजदूर दरवाजा खोलकर गाड़ी में से सामान उतारकर दूसरे मंजिल के एक घर में ले जा रहे थे यह उपक्रम एक-दो दिन चला। गाड़ी आती सामान उतरता और चली जाती। फिर कुछ दिन के बाद उस घर में से तरह-तरह की आवाजें आने लगी। क्योंकि वह घर कई दिनों से खाली पड़ा था इसलिए अचानक से तरह-तरह की आवाजों से सबका ध्यान उस तरफ आकर्षित होता था। मेरा भी हुआ।

अचानक देखा खिड़कियों की रंगाई पुताई होने लगी। दरवाजों की रंगाई पुताई हुई। ड्रिल मशीन की आवाजें आई जैसे कि पूरा घर पूरी तरह से मरम्मत किया जा रहा था और तो और तीन चार कमरों वाले घर के हर कमरे में अलग-अलग रंगों से पुताई भी हुई। कुछ दिनों के बाद इस सब शोर से अभ्यस्त होने के बाद अचानक से सन्नाटा छा गया। तीन-चार दिन के बाद उस घर से टेलीविजन चलने और गानों की आवाज आने लगी। कुछ दिन के बाद पता चला इसमें एक बड़े साहब सपरिवार रहने आए हैं।

दूसरे दिन सुबह 2_3 लड़कियां आती सफाई आदि करके चली जाती। दोपहर को एक दो लोग आते चले जाते शाम को 6- 7 बजे भी दो लड़कियों को जाते हुए देखा। सुबह एक ओमनी गाडी आती उसमें से एक व्यक्ति अखबारों की गड्डी ले करके उनके घर में जा कर के दे देता। परंतु सबसे ज्यादा वफादार व्यक्ति तो उनका गाड़ीवान यानि कि ड्राइवर था। जो कि सुबह 7:30 बजे हाजिर हो जाता छोटी लड़की और उसकी मां को स्कूल छोड़ने जाता। दोपहर में भी खड़ा हुआ दिखाई देता। शाम को 7:00 बजे 8:00 बजे तक गाड़ी दिखती। अचानक इस बात पर ध्यान गया कि एक tata sumo टाटा सूमो तो 24 घंटा खड़ी रहती है। तो मतलब साहब जी के पास 24 घंटे गाड़ी या गाड़ीवान सभी रहते। घर में लोगों का आना जाना लगा ही रहता। सुबह दोपहर शाम तो दो-तीन लड़कियां कभी-कभी कुछ लड़के घर में कुछ काम करके चले जाते हैं।

हमको इस घर में रहते हुए लगभग 4 साल से ज्यादा हो गए हैं। इन 4 सालों में पास के इंजीनियर के ऑफिस में अनगिनत बार किसी ना किसी बात को लेकर उनके रजिस्टर में शिकायत दर्ज करानी पड़ती है। कभी कोई नल चूने लगा कभी नल में पानी नहीं आ रहा है कभी पंखे का स्विच खराब हो गया कभी पंखा जल गया कभी स्विच में से आग निकलने लगती। किचन के एग्जॉस्ट फैन में से धुआं उठने लगा तो वे लोग आए और लेकर गए। आज ढाई साल से ज्यादा समय हो गया है आज तक पलट के पंखा नहीं आया। अक्सर बिजली विभाग के उस ऑफिस में बोलकर आते हैं कि भाई एग्जॉस्ट फैन किचन का नहीं आया। कोई ज्यादा सहूलियत भरा जवाब तो मिलता नहीं लेकिन अब शिकायत करना एक प्रक्रिया सी बन गई है या यूं कहें कि हमारे स्वभाव में शामिल हो चुका है। घर के दरवाजों में दीमक लगा हुआ है। नित प्रतिदिन कई कई ग्राम लकड़ी का बुरादा इकट्ठा करना पड़ता है। सफाई करनी पड़ती है। खिड़कियों में जो लोहे के तारों वाली जालियां लगी हैं उनसे जंक गिरने लगी है। छेद बन गए हैं। कई बार बोला। रजिस्टर में शिकायत दर्ज कराई। अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं कि कब इंजीनियर साहब की मेहरबानी हो जाए और हमारे घर में मरम्मत शुरु हो जाए।
जिस दिन से इस घर में आए हैं बारिश में छत के एक हिस्से से लगातार पानी चूता है। अक्सर हम लोग डिब्बा डिब्बे लगाकर के पानी इकट्ठा करके और बहाते रहते हैं। बाहर की बालकनी में तो पानी की धारा सी बहती है उस में कोई सामान ही नहीं रख पाते हैं। तो घर का एक तरफ का हिस्सा बारिश में अन उपयोगी हो जाता है। और बारिश भी लगभग 8 महीना से ज्यादा रहती हैं यहां पर। कई बार कह चुके हैं इंजीनियर से। इंजीनियर एक बार आया देखकर चला गया। एक दो बार तो उसने कहा आप हमारे भी बड़े साहब को एक दरखास्त दे दीजिए। अप्लीकेशन मैंने दो बार दी परंतु हमारे पास उसकी कोई कॉपी नहीं है जिससे कि हम साबित कर सके कि हमने इंजीनियर के बड़े इंजीनियर को दी है।
परंतु इस को क्या कहेंगे जो व्यक्ति अभी 4 दिन पहले घर में आया उसके आने के पहले ही घर की पूरी सफाई हो गई दरवाजे तुरंत बदल गए खिड़कियां बदल गई पुताई हो गई नल सब ठीक हो गए पंखा उनका सब लग गया इसको क्या कहा जाए??
तकदीर भाग्य?? वह व्यक्ति क्या है? कैसा है? जिसके लिए यह इंजीनियरिंग विभाग सदैव तत्पर रहता है और हम अक्सर गिड़गिड़ाया करते हैं। गिरते गिर गिर कर उसके पास जाते है। तब भी इंजीनियर के कान पर जूं नहीं रेंगती। हमारे मन में यह सब देख कर क्या भाव आते हैं यह केवल भगवान ही जानता है।
कुछ दिन हुए ही थे कि अचानक बाहर शोर होने लगा। मारपीट की आवाज आने लगीं। रोने पीटने की आवाजें भी आ रही थीं। शाम को टेलीविजन पर न्यूज़ देखी तब मामला समझ में आया।
दूर प्रदेश से एक स्त्री व उसके रिश्तेदार अचानक इन बड़े साहब के घर पर धावा बोल देते हैं और घर में घर की मालकिन से लड़ाई होती है। मारपीट होने लगती है। वह जो बाहर से स्त्री आई थी वह कह रही थी कि यह दूसरी स्त्री कहां से आ गई है। पहली शादीशुदा तो हम हैं। दूसरी पत्नी रखी है बच्चा भी कर लिया है।
पुलिस आई छानबीन हुई शिकायतों का दौर चला और इन बड़े साहब का पलटवार हुआ। टेलीविजन पर यह दिखा जैसे कि वह स्त्री और उसके रिश्तेदार इस घर में घुसकर मारपीट करने तथा छेड़छाड़ करने के अपराधी घोषित होगए।
फिर धीरे धीरे इस घर में भी हलचल गायब हुई। स्त्री गायब हो गई बच्IASचा गायब हो गया। कुछ दिन तो ऐसा लगा इस घर में कोई रहता ही नहीं है। कोई आता भी होगा तो गुपचुप तरीके से चले जाते पता ही नहीं चलता कि परिवार कहां रहता है। महीना भर के बाद जब मामला ठंडा हुआ तो फिर एक बार घर रोशन हो गया। वैसा ही फिर शुरु हो गया। सवेरे गाड़ी आती, अखबार आता, नौकर आते जाते रहते, जीना की सफाई होती, उनका सबसे ज्यादा वफादार ड्राइवर हमेशा तैनात रहता। 24 घंटा tata sumo दरवाजे पर खडी रहती। अक्सर आते-जाते रात में कहीं जाते दिन में कहीं जाते।
यह है हमारे मोहल्ले का हाल। वह अफसर एक प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। उनके सामने हम लोगों की क्या हैसियत है।

#Health Care System vis a vis #Urban #Rural and #Medicine systems #HealthCareSystem

A question always arises in mind whether public health system is better or private? I think such question if arises then it is in itself a proof that how much faith we have in public health system? But more often than not we have no other option but to go to public health system.
This debate is going on for very long. I suppose that this will continue for a long period of time. Question always arises whether government provide better health care facilities or private hospitals. All India estimates (in 2014) of rural areas indicated that private hospitals were preferred. Why? Since more number of cases were hospitalized in private hospitals that in public hospitals. Cases 581 per thousands were hospitalised in private hospital whereas 419 in public hospital. Similarly in urban areas 680 per thousand cases hospitalized in private hospitals and only 320 in public or government hospital.
The difference between type of hospitals in rural areas was about hundred or 200 cases. However in urban areas the difference was almost double that means urban private hospitals were most preferred. I don’t know how to infer that a public has more faith in private hospitals in urban areas?
Difference of double that of public hospital is a striking thereby indicating that there is a huge gap in coverage by public health system?? How to expand coverage by public health system is major challenge. Now at this stage we have to talk about coverage leaving aside the quality of health coverage.
More male patients than female are hospitalized in Private hospital compared to public hospitals? Is there any gender issue involved in this?
Or families prefer private hospitals for male patients in rural areas? The difference is not large though even though little bit difference is there. About 278 female and 303 male per thousands patients were taken into private hospital.
In A & N Islands, about 941 per thousand patients hospitalised in public hospitals in rural areas and only 59 per thousand patients in private hospitals. [50 male and 9 female]
No simple inference can be drawn, as in rural areas might not be having any option as not much private hospitals were available. States like Arunachal Pradesh, Assam, J&K, Manipur, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Odisha, Sikkim, Tripura and even in Delhi less number of patients were hospitalised in Private hospitals
Andhra Pradesh, Gujarat, Haryana, JharkhandKarnataka, Kerala, Maharastra, Punjab, Telangana, UP, Pudducherry more patients were hospitalised in Private Hospitals.
AP, Gujarat, Jharkhand, Karnataka, Kerala, Maharastra, Punjab, Telangana, UP, Pudducherry, almost more than double patients hospitalised in private hospitals than that of in Public Hospitals. In Urban areas, AP, Bihar, Chattisgarh, Gujarat, Haryana, Jharkhand, Karnataka, Kerala, Maharastra, Nagaland, Tamil Nadu, Telangana, UP, Uttarakhand large number of patients were hospitalised in private hospitals. In few states the number was three times higher than that of public hospitals.
Allopathy is still the most preferred choice of treatment. In urban areas 94.4% Male and 91% female received treatment in Allopathy medicine. All other Indian system of medicine i.e Homeopathy, Yoga, Naturopathy got only less than 7% of total patient share. All these system collectively named as AYUSH.
If data is to be believed then Nagaland shows 82% male received treatment in other system of medicine? While female received 100% Allopathy? Is it a mistake of data entry?
Over all more number of patients got treatment in other form of medicine was observed in Tripura(18), kerala(15.3), Punjab(14.8), Lakshdweep(11.5). Chattisgarh(11.2), Rajasthan(10.3), Himachal Pradesh and A & N Islands (10.1).
However, if any recent study is done few places will top the chart for usinf AYUSH including A & N Islands. I saw long queues standing in AYUSH hospital waiting for their turn to meet Ayurvedic or Homeopathic doctors. Few like to visit AYUSH, as many costly brand medicine are provided free of cost. I overheard two persons talking each other about this.

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Reference: Key Indicators of Social Consumption in India,  Health, NSS 71″ Round, (January- June 2014), National Sample Survey Office, June2 015

Dream is must. सपना जरूरी है 

Swayamkatha

Dream is must. सपना जरूरी है

until and unless one do not have a dream he cannot march forward that means one has to have some goals/objective in life to achieve.   wile talking on INDIA TV Swami Ramdev said all  this. He was telling something about his childhood life etc.

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He said he used to get secondhand books, as he could not afford to buy new books when he was in school. he was born to a poor family?

Asked by Rajat Sharma about his English speaking skill? he tactfully replied that even a sweeper in England speaks English, what’s so great about speaking English?

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It is only in India this perception is there if one speaks English he is elite or great person. That’s wrong perception, it has deep roots in the British rule, as that time it was language of rulers and Slave thought that speaking this language…

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