My Gaon-connection? my travel to a Village

This is what many imagine of our village life?

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Village life is not simple as it looks. this structure is called bangla –बंगला

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09e4e8e646684fba329f14170031f5e3cc6873a8914ac764a0930e66714c50e5download (7)485474418-640x640images (17)c4d8a2d9ba5ab4e7abb8c7b08b3b5d4641069e985b5f24913afbcf5fc04eb181b992f9a4680160c4db3da0a77a2ca56a402c3d035161dd5825bf7f7379adbd4baf580fd8d36123c19a773e5f028ce8d1शाम होते ही गांव में अजीब सी हलचल होने लगी। अजीब सी बेचैनी सी पूरे माहौल में थी। सब कोई जल्दी-जल्दी यहां वहां आ जा रहा था। सबको जल्दी पड़ी थी अपने अपने घर या अपने अपने ठिकानो पर पहुंचने की। जैसे किसी अनहोनी घटना से आशंकित थे सभी। विशेष तौर पर घरों की महिलाएं। बिजली का तो नामोनिशान नहीं था उन दिनों गांव में। शायद ही कोई घर होगा जहां बिजली आती थी।

हां लेकिन गांव के बाहर खेतों की तरफ कुछ ट्यूबवेल होते थे वहां बिजली आती थी। क्योंकि उनसे ही खेतों में सिंचाई होती थी। वहां पर ऊंचाई पर बल्ब लगा होता था और कुछ लोगों की बहुत पारखी नजर होती थी पता नहीं कैसे वे लोग भरी दुपहरिया में देखकर पहचान जाते थे कि बिजली आ गई है। पता नहीं उनको कैसे बल्ब जलता हुआ दिख जाता था? तदोपरांत उस समय कुछ लोग सरपट उस तरफ दौड़ पढ़ते थे। पंप चालू किया जाता था। कई बार तो नादी को पानी से भरने के लिए और पंप के चारों तरफ जो बगीचा होता था उसकी सिंचाई के लिए भी पंप को चलाया जाता था।

कुछ पंपों में आटा चक्की लगी होती थी। bulandshahrweb_Atta-Chakki-in-Bulandshahr_07232b0b-2_28-04-2016114946कई गांवों के बीच में एक चक्की थी। वहां पर कुछ दिनों पहले से ही बोरियों का जमावाड़ा लग जाता था। सबको पता था कि जब बिजली आएगी तभी आंटा पिसा जाएगा। यानी सब लोगों में बहुत धैर्य था।

 

 

 

 

 

इन्हीं पंपों के आसपास हरियाली का झुरमुट होता था यानि कि छोटा सा बगीचा होता था। इन बगीचों में लगे होते थे नीम आम कटहल कभी पपीता, तुलसी और कुछ शौकीन लोग होते थे तो वे लोग गेंदा आदि फूल भी लगा लेते थे। 40593508_676607346052096_8334848906780878911_nऔर कुछ ऐसे पंप ट्यूबवेल हाउस भी हमने देखे जिनमें कुछ सब्जियां भी उगाती गई थीं। जैसे कि लौकी, कद्दू टमाटर, सेम आदि। ऐसे झुरमुट क्योंकि गांव से थोड़ा हटकर खेतों की तरफ होते थे तो ऐसी जगहें युवा मन आकर अपना मन हल्का करते थे। तलइया, तालाब या फिर नादी(टंकी) में उन्मुक्त मन से नहाते थे। कोई देखने वाला रोकने वाला नहीं होता था। मतलब यहां महिलाओं से है। क्यूंकि युवतियां भरी दोपहरी में ऐसे खेतों पर नहीं होती थी। और होती भी थीं तो विशेष तौर पर ऐसे झुरमुट के पास जाती ही नहीं थी। और ऐसे झुरमुट निजी संपत्ति होते थे इसलिए जब तक कोई विशेष कारण या प्रयोजन नहीं हो तो वहां कोई जाता भी नहीं था। हां अगर युवक युवतियां जान पहचान वाले हुए तो ऐसे ही झुरमुट उनको एकांत में मिलने का शुभ अवसर प्रदान करते थे। वहां पहुंचने के लिए कुछ बहाना बनाया जाता था। युवतियां कई तरह के बहाने बनातीं थीं। इस उपक्रम में सहेलियां सहजता से सहयोग करती हैं। गाय गोरू चराने, चक्की से आटा पिसवाने, खेत से कुछ लाने के लिए आदि बहाने होते थे। सखी सहेली मिलकर खेतों पर जाती हैं घर में सबको पता है कि वह खेत पर गई है। लड़कियां मिलकर गई हैं इसलिए कोई डर नहीं है। पर होता उल्टा है। जिनकी दोस्ती है वे ऐसे मौकों का फायदा उठाते हैं।
आज शाम होते ही जो लोग रात ट्यूबवेल पर बिताते हैं वे भी जल्दी से लौट रहे थे। अंधेरा गहराते ही गलियों में सन्नाटा छाने लगा। अचानक एक ओर से शोर हुआ तो घरों की छतों से असंख्य टार्चें जल उठीं। उधर से कुछ लोग जल्दी जल्दी चलते हुए आ रहे थे। आवाजों के सहारे गांव में खबर फैली कि डड़ियां(जंगल) में डकैत आ गये हैं।
जैसे ही खबर गांव में फैली और घर की छत से नीचे आंगन में सुनाई पड़ी इन्द्रसेन मामी तो रोने लगीं। हाय दइया अब का हुईहै। हमका करिबे। मामी लगभग दौड़ती हुई घर का सारा सामान जेवर जेवरात आदि पोटलियों में बांधकर भूसौरी में यहां-वहां खोसने लगीं, छुपाने की चेष्टा करती। हम लोग वहां से निकल कर अपने रामप्रकाश मामा के घर वापस आ गए।
आज रामप्रकाश मामा की बरात निकलनी है। फिर कानाफूसी शुरू हो गई। एक बात यह पता चली कि शहर से रामप्रकाश की बहन और दामाद सपरिवार आए हैं और मालटाल भी लाए हैं। इसलिए लुटेरे ताक में बैठे हैं।
फिर देर शाम को बारात निकली लेकिन भय के माहौल में। कई किलोमीटर दूर जाना है। बस तो है नहीं कि एक बस में सारे लोग आ जाएंगे। बस को गांव तक आने के लिए सड़क भी तो होनी चाहिए?
हम लोग छुट्टियों में यहां आते हैं तो मुख्य सड़क पर बस से उतरने के बाद लगभग 4 किलोमीटर पैदल ही खेतों के बीच में से चलकर ही इस गांव में पहुंचते हैं। कभी-कभार बैलगाड़ी भी से भी आते हैं। रास्ता तो लंबा ही है। खेतों में जब फसल लगी हुई मिलती है तो चारों तरफ हरियाली के बीच चलते हुए थकावट कम महसूस होती है। ऐसे चलते हुए कभी कभार कोई खरगोश दिख जाता, कभी लोमड़ी, सांप या मोर और अत्यंत तरीके की चिड़ियां चहचहाती फड़फड़ाती दिखाई देती हैं। कभी खेत से गन्ना तोड़कर खाने का मौका मिल जाता था। रास्ते में जान पहचान का कोई मिल जाता तो नानी के चरण छूता और सत्कार करता। क्योंकि नानी जी इस गांव की बेटी हैं तो सारा गांव और सारे लोग रिश्ते में कुछ न कुछ लगते हैं। बेटी विवाह के बाद मान्य होती है। भांजे आदि सम्मानीय मानें जाते हैं। हम तो किसी के भांजे या नाती लगे पर नानी जी तो सबके लिए सम्माननीय हैं। पर हम बच्चों को तो गन्ना चूसने को मिल जाता है यही कम है क्या? कभी कोई सब्जी कोई साग या फिर कोई दिल बहलाने वाली चीजें मिल जाती थीं भुट्टा आदि।
अक्सर जब बस से उतरते थे हरदोई में सांण्डी रोड पर बघराई गांव में तो सड़क के किनारे पर स्थित कुआं और पास में जुम्मन मियां की दर्जी की दुकान थी। उस झोपड़ी नुमा जगह में छप्पर के नीचे बैठने से मई जून की भरी दुपहरिया की गर्मी से राहत मिलती थी। बहुत कुछ तो वहां के माहोल से ही असर होता था। नानी जी को चरणस्पर्श कहते हुए उनके और हमारे लिए तख्त या खाट पर बैठने के लिए कहना आग्रह करना फिर किसी को बोलना कि कुएं से ठण्डा पानी लाए यह सब होता था सच्चे मन भाव से और मिठास से सम्मबोधन करना वही माहौल को खुशनुमा बना देता था। नानी तो बाहमन थी इसलिए किसी और का श्पर्स किया हुआ तो छुएंगी भी नहीं पर सब कुछ खुशनुमा ढंग से किया जाता था कटुता का तो पता ही नही चलता था। फिर मामा ही कुएं से पानी निकालते और नानी पीतीं। पर हम बच्चों की बात और थी। कुछ न कुछ तो खाते ही थे। पर हां उनका छुआ हुआ नहीं। गुड़ या फिर गुड़ में पागे गये बेसन के सेव मिलते थे। वह भी वहां सड़क के किनारे पर स्थित दुकान से खरीदे जाते थे। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद गांव के लिए यात्रा शुरू होती थी। कभी कभी बैलगाड़ी लगाई जाती थी लेकिन अगर उस समय पर सब लोग खेतों के काम से बाहर गए हुए थे तो नहीं मिलती थी पर हां अगर गांव से पहले ही आगयी होती थी तबतो हम बच्चों की बल्ले बल्ले हो जाती थी।
एक बुजुर्ग गांव में कुछ लोगों को पुराना किस्सा सुना रहा था हमने भी सुना। झुण्ड में से किसी ने उनसे आग्रह किया कि चच्चू वहीं किस्सा सुनाओ तो उन बुजुर्ग ने आरंभ किया कहानी सुनाना अपनी किस्सा गोई के लिए शायद वे सज्जन प्रसिद्ध थे। और यह निवेदन करना। उनका यह किस्सा सुनाना आज नहीं परन्तु वर्षों से चल रहा है और निरंतर जारी रहेगा उनके जीवित रहने तक। यह हमारे ग्राम की परंपरा है और इस उपक्रम से समाज में निकटता बढ़ती है सभी लोग भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं। ऐसे ही लोकोक्तियों का निर्माण होता है। शदियों पुरानी बातें किस्से कहानियां जीवित रहतीं हैं। इसी को लोककथा भी कह सकते हैं। यही सब लोक-संस्कृति की परंपरा बनते हैं उसका संम्बर्धन करते हैं। उस दिन हमको भी प्रमाण मिला हमारी नानी के एक भाई थे जो कि अंग्रेजों के समय कुख्यात थे। मतलब अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बने रहते थे। यह बुजुर्ग उनकी ही एक कहानी सुना रहे थे। सब लोग बार बार उनसे किस्सा सुनते थे क्यूंकि उनका सुनाने किस्सा कहने का तरीका सबको भाता था। वे नाना जिनका किस्सा था उन्होंने कह दिया था वहां के थानेदार को कि उनकी इजाजत के बगैर कोई अंग्रेजी पुलिस गांव में दाखिल नहीं होगी।
तो हमारे वह नाना जी उस क्षेत्र में प्रसिद्ध थे इसलिए उनका नाम सुनते ही लोग अक्सर मदद करते थे गांव जाने के लिए बैलगाड़ी देने में या फिर संदेश पहुंचाने में।
पर आजकल का समय सोच कर लगता है कि गांव के वह क्या दिन थे सपने सुहाने से लगते हैं वे दिन। अब तो हर चीज में बंटवारा हो गया है। परिवार समाज मोहल्ले में गांव में ही बंटवारा हो गया है।

 

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Published by

Gaurang Katyayan misra

I am nobody on this vast globe. trying to search for my relevance for existence. Trying to read boundaries.. how to demolish them? want to walk on path of wisdom.. such as vivekananda, Ram, Krishna, Meera, kabir, Sankaracharya, rani chennama, ahilyabai holkar, Laxmi bai, umrao jaan, Rai praveen, Chanakya, SitaRam Raju, Shiva ji, lachit burfukan, Sankar Dev, list is endless

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